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जलाते रहे बुझाते रहे / सुमन पोखरेल

  • Sep 3, 2018
  • 1 min read

कदम पे कदम यूँ मिलाते रहे

तेरे शान खूब हम बढाते रहे

हमे रात दिन याद आते रहे

जिन्हे उम्र भर हम भूलाते रहे

तजुर्बा-ए-मोहब्बत न था दोनो को

हम देखते रहे, वो शरमाते रहे

हकिकत में खुसियाँ न थी वस्ल की

तसब्बुर में उन्हे पास लाते रहे

मेरा जिक्र जब भी हुवा बज्म में

हया से वो सुर्ख चेहरा छुपाते रहे

सिकस्ती के बाद किया काम नयाँ

मुकद्दर को यूँ हम जगाते रहे

देता रहा दिल तुम उन को सुमन !

जो जलाते रहे बुझाते रहे

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